Wednesday, October 19, 2011

mobile haadsa....

आज मेरे बेचारे मोबाइल के साथ एक हादसा हो गया, न जाने कैसे वो मुझसे अलग हो गया| मुझे तो खबर भी नहीं लगी कि वो बेचारा कहीं अकेला बैठा हुआ मेरा इंतज़ार कर रहा था| शैक्षिक तकनीकी का period खत्म होते ही में पहुंची लाइफ सेवर लाइब्ररी में और नोटबुक निकालने के लिए बैग को खोला| झोले के अन्दर का झोल देखकर मेरे तो पसीने छूट गए..... मोबाइल अपनी जगह से नदारत था| फिर क्या था, मैने आव देखा न ताव लगी बैग को टटोलने और झंझोरने पर हासिल कुछ न हुआ| मोबाइल था भी साइलेंट मोड पर, ढूंढे तो ढूंढे कैसे| फिर भी मन कि तस्सल्ली के लिए एक सहेली से उसका फ़ोन लिया उधार और लगे अपने मोबाइल को खोजने| कॉल करें तो रिंग तो बजे पर मोबाइल कही न मिले| हर मुमकिन जगह पे तलाश किया, लाइब्ररी कि जिस अलमारी के साथ एक घंटा व्यतीत किया था वहां जाकर भी उसकी झनझनाहट सुनने कि कोशिश की, हासिल कुछ न हुआ| क्लास रूम का बंद ताला खुलवाया, खूब ढूंढा- टेबल के ऊपर भी और कुर्सी के नीचे भी, पर मोबाइल साहब का कुछ पता नहीं| 

चिंता में मैं बेचारी मरी जाऊं कि मेरा मोबाइल पता नहीं किस कोने में अकेला बैठा हुआ मेरी राह ताक रहा होगा| अचानक ही एक भयानक ख्याल ने मेरे दिल को हिला के रख दिया कि कहीं मेरे नोकिया को किसी ने किडनैप तो नहीं कर लिया| वो बेचारा तो स्वयं की रक्षा भी नहीं कर सकता, ट्रैकर तो है नहीं उसमे| पर फिर मेरे दिमाग ने मेरे दिल को समझाया कि नहीं रे पगले किडनैप हुआ होता तो अभी तक जिंदा थोड़े ही होता.... अरे भई रिंग जो सुनाई  दे रही थी| दिल ने दिमाग को झडकाया और कहा कि जनाब फिर जोर दो अपनी याददाश्त पर और सोचो कि कहाँ छोड़ आए उससे तनहा तुम| दिमाग ने भी खूब जोर लगाया और आखिरकार बत्ती जल गई|

मैं पहुंची सीधे अपनी dissertation गाइड के केबिन तक, पर वो तो था बंद| करें तो करें क्या? फिर जली दिमाग कि बत्ती और ली एक और लेक्चरार कि मदद| उनके पास थी गाइड मैडम के केबिन के दरवाज़े की चाबी | लेके चाबी उनसे दिया उनके इस सवाल का जवाब कि चाहिए क्यूँ? वो भी मुस्कुरा दीं मेरी हालत देखकर| बहरहाल फटाक से जाके चाबी लगे घुमाने पर दरवाज़ा कहे मैं तो नहीं खुलता, जा कर ले जो करना है..... मै भी कहाँ मान ने वाली थी, लगी चाबी को घुमाने आगे पीछे| आखिरकार लॉक को तरस आया और वो खुल गया| दरवाज़े को धक्का मार के खोला तो जान में जान आ गई, मेरा नोकिया मैडम कि मेज़ पर आराम से बैठा आराम कर रहा था| फटाक से उसे उठाके गले लगाया और वहीँ खड़े खड़े कॉल हिस्टरी और मैसेजिज़ कि लिस्ट पढ़ डाली | होश आया कि केबिन को लॉक कर के बाहर निकल जाना चाहिए| रिलौक करके दरवाज़े को चाबी लौटाई और मैं बुद्धू वापस लाइब्ररी लौट आई, वो भी अपने मोबाईल के साथ!! भगवान् भली करे....

4 comments:

  1. दरवाज़े को धक्का मार के खोला तो जान में जान आ गई, मेरा नोकिया मैडम कि मेज़ पर आराम से बैठा आराम कर रहा था|
    ऐसा कई बार हो जाता है।अच्छा लगा पढकर।

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  2. Thank u very much, Ma'am....:)I agree, aisa kai baar ho jata hai!!

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  3. Replies
    1. Thank u for liking, Mr. Tripathi....:)

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